रामेश्वरम मंदिर की स्थापना का रहस्य

दोस्तो, भारत के प्रमुख धर धामों में से एक है रामेश्वर धाम। यहां मौजूद रामेश्वरम मंदिर के अद्भुत रहस्यों की जानकारी आज हम आपको देंगे। आज हम इस आर्टिकल में Rameshwaram mandir history mystery की जानकारी देंगे।

तो इस आर्टिकल को अंत तक पढ़े ताकि आप इस Rameshwaram mandir में खुद को जाने से रोक नही सकेंगे। भारत के प्रमुख चार धाम है जिसमे बद्रीनाथ द्वारका जगन्नाथपुरी और रामेश्वरम का नाम शुमार है। अगर आपने आज इस रहस्यों को जान लिया तो आप यकीनन जीवन में एक बार रामेश्वर जरूर जायेंगे।

रामेश्वर मंदिर के निर्माण की कहानी और इतिहास

Rameshwaram mandir

रामेश्वर हिंदू समाज का एक पवित्र तीर्थक्षेत्र है। Rameshwaram mandir रामनाथपुरम जिले में स्थित है। इस मंदिर की महिमा अनोखी है। यह मौजूद शिवलिंग इन 12 ज्योतिर्लिंगों में एक है। भारत के उत्तर में स्तित काशी को लोग जितना मानते है उतना ही दक्षिण में रामेश्वरम को मानते है।

इसका निर्माण द्वीप पर हुआ है। ये हिंद महासागर और बंगाल उपसागर की खाड़ीओ से चारो और से घिरा हुआ है। बहुत पहले ये द्वीप भारत के धरती से जुड़ा हुआ था। बाद में सागर की लहरों से इस किनारा टूट गया। और इसकी रचना द्वीप जैसी हो गई।

इसका नाम रामेश्वरम रखा गया क्यू की, भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले इसी जगह पत्थर के सेतु का निर्माण करवाया था। सेतु के निर्माण के बाद यह से भगवान राम और उनकी सेना लंका तक पहुंची और रावण पर विजय हासिल की थी।

अगर मंदिर की बात करे तो इसकी कलाकारी देखकर आपके नजर गहरा जाति है और जिसने भी इसे बनाया है उसको प्रणाम करने का दिल करता है। मंदिर की दिवारी तटाओ पी मौजूद बारीकी से की कलाकारी देखकर आपका मन मंत्रमुग्ध हो जाता है।

मंदिर के प्रवेशद्वार 40 फीट ऊंचा है। रामेश्वरम की परिक्रमा पूरी करने के लिए तीन रेट बनाए गए थे। पहला रास्ता खोल की 100 साल पहले पूरा हुआ। इसी के साथ या पांच फीट ऊंचा और आठ फीट चौड़ा चबूतरा बना हुआ है।

रामेश्वरम की परिक्रमा करने केबलिए आपको इसी चबूतरे का सहारा लेने पड़ता है। मंदिर की परिक्रमा करते वक्त आपको बाजू में बड़े बड़े खंबे नजर आएंगे। ये इस मंदिर की शोभा बढ़ाने में अहम योगदान देते है। हर खंबा दिखने में अलग है। अगर आप उसे नजदीक से देखे तो इसपर बनाई गई कारीगरी आपका मन प्रसन्न करती है।

बाकी दो प्रकार के गलियारे विश्व के सबसे बड़े गलियारे में से एक है। ये मंदिर द्वीप पे बसने के बावजूद यह एक भी बड़े बड़े पत्थर नही है। ये देखकर आश्चर्य होता है की उस समय ये मंदिर कैसे बनाया होगा। ये मंदिर बनाने के पिए कितनी मेहनत की होगी। ऐसा मानना है की, मंदिर के निर्माण में जितने भी पत्थर लाए गए वो दूर दूर से नाव में भरकर लाए थे।

मंदिर में एक काला पत्थर है जो भगवान राम ने केवटराज को उसके राजतिलक के वक्त भेट दिया था। आज भी लाखो लोग इस पत्थर को देखने के लिए रामनाथपुरम जिले में जाते है। रामनाथपुर Rameshwaram mandir से 35 मिल दूर है।

रामेश्वर धाम कि स्थापना कब हुई

जब भगवान श्रीराम लंकापति रावण का वध करके वापस आ रहे थे तो सबसे पहले उन्होंने गंधमादन पर्वत पे ही विश्राम किया था। उन्होंने किया पराक्रम देखने और उन्हे देखने बड़े बड़े ऋषिमुनि गंधमादन पर्वत पहुंचे।

जैसे ही ऋषि भगवान राम से भेट करने गंधमादन पर्वत पहुंचे तो भगवान राम ने कहा की उनपर ब्रह्म हत्या का पाप लगा है। उन्होंने ऋषि से उपाय बताने के लिए कहा। ऋषिने आपस में विचार किया और भगवान राम को शिवलिंग स्थापित करने की सलाह दी।

ऋषिमुनियो ने कहा की शिवलिंग की स्थापना और पूजन करने के आप सभी पापो से मुक्त हो जाएंगे। भगवान राम ने अंजली पुत्र हनुमान से आग्रह किया को वो कैलाश पर्वत जाए और शिवलिंग लेकर आए। भगवान हनुमानजी ने प्रभु श्रीरामजी का आदेश माना और कैलाश की और प्रस्थान किया। लेकिन यह उन्हे शिवलिंग के दर्शन नहीं हुए।

तब भगवान हनुमान ने कैलाश पर्वत पर शिवजी की आराधना की और तप के बाद उन्हें शिवजी प्रसन्न हुए। शिवजी ने वरदान में शिवलिंग दिया। उसे लेकर वो गंधमादन पर्वत को और चले आए।

लेकिन हनुमान जी को आने में काफी समय हुआ था। ऋषिमुनी अच्छे मुहूर्त पे शिवलिंग की स्थापना करना चाहते थे तो उन्होंने भगवान राम और माता सीता को शिवलिंग बनाने को कहा। कहा जाता है की उस समय माता सीता ने अपने बालो से शिवलिंग बनाया था।

जब हनुमान जी गंधमादन पर्वत पर आए तो उन्हे पहले ही बनाया और स्थापित किया शिवलिंग मिला। उसे देखकर हनुमान जी को अपने आप से बड़ा दुख प्राप्त हुआ। इसपर भगवान राम ने उन्हें समझाया की क्यों उन्हे लिंग स्थापित करना पड़ा। बताए जाने के बावजूद भी जब हनुमान जी नही माने तो राम ने हनुमान की लिंग उखड़ने की इजाजत दे दी।

बार बार प्रयास करने के बावजूद भी हनुमान जी स्थापित लिंग को उखाड़ने में यशस्वी नही हुए। इस प्रयास में वो कही दूर जाकर गिर पड़े और मोचित हो गए। जब उनकी नींद खुली तो उन्हे राम के रूप में विश्वकर्ता के दर्शन हुए। उन्हे उनके किए का पच्याताप हुआ और वो भगवान राम के चरणों में गिर पड़े।

भगवान राम ने कहा की उनके स्थापित शिवलिंग को दुनिया का कोई भी इंसान उखाड़ नही सकता। उन्होंने हनुमानजी को माफ कर दिया और उनके कैलाश से लाए शिवलिंग को उसी स्थान पी प्रस्थापित कर दिया।

श्रीरामजी ने इस शिवलिंग का नाम हनुमदेश्वर रख दिया। कहा जाता है की शुरुवात में ऋषिमुनि ने मिलकर इस मंदिर का संगीपन एवम निर्माण किया। बाद ने लंका के राजा ने इस मंदिर की देखरख और सौंदर्य पे विशेष ध्यान दिया।

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